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आज का लाइव सत्संग

श्री प्राणनाथ जी वाणी (सोमवार – शुक्रवार)

चितवन04:30 AM – 06:00 AM
श्री बीतक मंथन06:00 AM – 07:00 AM
श्री तारतम वाणी चर्चा07:00 AM – 07:30 AM
श्री परमेश्वरी बाई जी

श्री परमेश्वरी बाई जी

वाणी मंथन, चितवन और रहनी का कोई विकल्प नहीं

जन्म

1902

समाधि

1965

संप्रदाय

निजानंद

जीवनी

ई सन् 1902 के एक शुभ दिन रियासत बहावलपुर (वर्तमान पाकिस्तान) के एक छोटे से गाँव चकचौपा के एक ग़रीब घर में एक लड़की का जन्म हुआ | उनके पिता का नाम कन्हैया लाल खुराना और माता का नाम आसोबाई था।माता पिता आनंद विभोर हो उठे | इससे पहले इनके दो बालकों की मृत्यु हो चुकी थी | बहावलनगर की गद्दी के पू॰ महाराज श्री हरिदास जी के उत्तराधिकारी महाराज श्री वल्लभदास जी के आशीर्वाद स्वरूप इस बालिका का जन्म हुआ था | परमेश्वर की इस देन को परमेश्वरी नाम दिया गया | बचपन से ही बालिका परमेश्वर के ही रूप को बनाकर उसी से ही खेलकर निमग्न रहती थी | संयोगवश 5 वर्ष की आयु में चेचक की वजह से आँखों की रोशनी चली गयी लेकिन अंदर के चक्षु खुल गये | इसी ने उनकी सुरता को परमात्मा के प्रति और दृढ़ कर दिया |

जब इनकी उम्र 10 वर्ष की थी तब इनके माता पिता चकचौपा से बहावलनगर आ गये और प्रणामी मंदिर के नज़दीक ही एक छोटे से घर में रहने लगे | बालिका प्रतिदिन वहाँ जाकर दर्शन ,ध्यान , पाठ इत्यादि किया करती थी | इस मंदिर में एक सेवाभावी महिला बुद्धाबाई थीं जो इनको तारतम सागर की चौपाइयाँ सुनाती थीं जो इनको कंठस्थ होने लगीं |

तारतम मंत्र ग्रहण करने की जिद्द के चलते तीन दिन तक अन्न जल का भी त्याग किया | मंत्र ग्रहण करने के बाद पूरे तीन महीने तक एकांत में तारतम मंत्र का अनहद जाप भी किया जिससे मुखमण्डल प्रदीप्त हो उठा | अब अंतःप्रेरणा से बालिका ने पद्मावतीपुरी की यात्रा की और वहाँ 22 दिन तक निराहार रहकर तपस्या भी की | अब इनकी इच्छा सेवा पूजा घर में लाने की थी | एक वर्ष बाद कालिम्पोंग के महाराज श्री मंगलदास जी एवं बहावलनगर के श्री मोहरीशाह तनेजा की मदद से पन्ना जी से सेवा पूजा लाकर इनके घर पधरायी गयी | अब तो उनकी खुशी का पारावार नहीं था उनकी सब इच्छा पूरी हो रहीं थीं |

श्री परम पूज्य परमेश्वरी बाई जी

माता पिता की इनको विवाह बंधन में बांधने की लाख कोशिशें भी नाकामयाब रहीं | अपनी सारी जमा पूँजी लगाकर बहावलनगर में एक मंदिर का निर्माण करवाया |

देश विभाजन के बाद सूरत में कुछ दिन रहने के बाद जयपुर आकर रहने लगे |

ई सन् 1956 में आदर्शनगर जयपुर में बसंतपंचमी के दिन प्रणामी मंदिर की स्थापना की | समग्र श्री 108 कुलजम वाणी टीका सहित उनकी रसना पर स्थित हो चुकी थी | मंदिर में बालिकाओं और स्त्रियों का तांता बंध गया | मंदिर में सभी जन उनके प्रवचन सुनने को लालायित रहने लगे और इस तरह मंदिर में भजन कीर्तन और प्रवचन इत्यादि की प्रेम गंगा प्रवाहित होने लगी | नर, नारी, बालक बूढ़े उनको बहिन जी उर्फ बेबी जी कह कर पुकारते थे।

श्री परम पूज्य परमेश्वरी बाई जी

आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए ई सन् 1965 में 5 जनवरी की रात को सवा एक बजे उनका ध्यानावस्था में ही धामगमन हुआ | उन्होंने जिस मंदिर की स्थापना की थी उनको उसी मंदिर में समाधि दी गई | आज भी वह मंदिर बेबी जी का मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है |

परम पूज्य बेबी परमेश्वरी बाई जी के जीवन की सादगी, सहनशीलता, सेवा, प्रेम, त्याग, निष्ठा, एवं श्री राज जी महाराज से अनन्य प्रेम के गुणों को हम भी अपने जीवन का आदर्श बनायें | तब हमारा जीवन भी उन्हीं की तरह सुगंधित होने लगेगा |

परमहंस संक्षिप्त परिचय पढ़ने के लिए और समय निकालने के लिए धन्यवाद।
हम आपसे अनुरोध करते हैं कि आप हमें अपनी ईमानदार प्रतिक्रिया दें।

सप्रेम प्रणाम जी !

आध्यात्मिक यात्रा

1902

जन्म

रियासत बहावलपुर के चकचौपा गाँव में एक गरीब परिवार में जन्म हुआ। जन्म को संतों के आशीर्वाद का फल माना गया और उनका नाम परमेश्वरी रखा गया।

5 वर्ष

दृष्टि का नष्ट होना

चेचक के कारण आँखों की रोशनी चली गई, लेकिन इससे उनकी आंतरिक आध्यात्मिक दृष्टि और भक्ति और अधिक प्रबल हो गई।

10 वर्ष

प्रणामी मंदिर से जुड़ाव

परिवार बहावलनगर आकर रहने लगा। परमेश्वरी बाई जी प्रतिदिन मंदिर जाकर दर्शन, ध्यान और पाठ करने लगीं।

बाल्यकाल

तारतम वाणी का अध्ययन

मंदिर की सेविका बुद्धाबाई से तारतम सागर की चौपाइयाँ सुनकर उन्हें कंठस्थ करने लगीं।

युवा अवस्था

तारतम मंत्र दीक्षा

तारतम मंत्र प्राप्त करने की जिद में तीन दिन तक अन्न-जल त्याग दिया और दीक्षा के बाद तीन महीने तक निरंतर अनहद जाप किया।

पद्मावतीपुरी यात्रा

तपस्या

पद्मावतीपुरी धाम की यात्रा की और 22 दिनों तक निराहार रहकर कठोर तपस्या की।

सेवा स्थापना

घर में सेवा पूजा

महाराज मंगलदास जी और मोहरीशाह तनेजा की सहायता से पन्ना जी से सेवा पूजा अपने घर लाकर स्थापित की।

मंदिर निर्माण

बहावलनगर मंदिर

अपनी पूरी जमा पूंजी लगाकर बहावलनगर में एक मंदिर का निर्माण करवाया।

देश विभाजन

भारत आगमन

विभाजन के बाद कुछ समय सूरत में रहने के पश्चात जयपुर में निवास किया।

1956

जयपुर मंदिर स्थापना

बसंत पंचमी के दिन आदर्श नगर जयपुर में प्रणामी मंदिर की स्थापना की और वहाँ प्रवचन, भजन और सत्संग प्रारंभ हुए।

जीवन काल

धर्म प्रचार

बालिकाओं और महिलाओं को धर्म शिक्षा दी और श्री कुलजम वाणी का गहन प्रचार किया।

1965

धाम गमन

5 जनवरी 1965 की रात ध्यानावस्था में धामगमन हुआ। उसी मंदिर में उनकी समाधि स्थापित की गई जिसे आज 'बेबी जी का मंदिर' कहा जाता है।

स्थापित पीठ एवं मंदिर

जयपुर मंदिर

श्री प्राणनाथ जी मंदिर बी-14, गोविन्द मार्ग, राज खुराना हॉस्पिटल के पास, आदर्श नगर, जयपुर

प्रमुख उपदेश

बालिकाओं और महिलाओं को धर्म शिक्षा दी और श्री कुलजम वाणी का गहन प्रचार किया।

प्रमुख स्थान

अन्य सतगुरु